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मां शारदा की पौराणिक कथा-
यह माना जाता है कि भगवान शिव अपनी पत्नी सती की मृत्यु के पश्चात गहरे शोक एवं निराशा में चले गये और उनके शव को लेकर पूरी पृथ्वी में घूमने लगे। ऐसी स्थिति को देखकर भगवान विष्णु ने मानव जाति की सुरक्षा के लिये सती के शव के 52 भागों में विभाजित कर दिया। मां सती के शव के भाग जहां जहां पर गिरें वहां पर शक्तिपीठ का निर्माण हुआ। मैहर में मां के गले का हार गिरा और यहां पर मंदिर की स्थापना हुई। मैहर का अगर सन्धि विच्छेद किया जाये तो यह सही लगता है माई-हार।
क्षे़त्रिय परंपरा यह मानती है कि महान योद्धा आल्हा और उदल इस स्थान से जुडे है। दोनो भाइयों को मां शारदा का अनन्य भक्त माना जाता है। आल्हा ने मां शारदा की कठिन तपस्या कर अमरत्व का वरदान प्राप्त किया था। इन दोनों भाइयों ने ही सबसें पहले इस जंगल में आकर मां शारदा के दर्शन किये थे। आल्हा ने इस स्थान को शारदा माई के नाम से प्रसिद्ध किया। आज भी यह माना जाता है कि प्रतिदिन सबसे पहले मां के दर्शन आल्हा ही करते है। उनके नाम का तालाब और अखाडा आज भी मां के मंदिर के पीछे लगभग दो किमी की दूरी पर स्थित है। इसके साथ ही यह भी माना जाता है कि यहां पर प्रथम आदि गुरू शंकराचार्य ने सबसे पहले 9 वी या 10 वी शताब्दी में यहां पूजा अर्चना की।
मां शारदा मंदिर
मैहर नगरी से लगभग 5 किमी की दूरी पर स्थित त्रिकुट पर्वत पर मां शारदा का मंदिर स्थापित है। जहां 1063 सीडियों के माध्यम से पहुचा जाता है। पर्वत की चोटी के मध्य मा शारदा का मंदिर स्थापित है। पर्वत पर मां के मंदिर के अतिरिक्त काल भैरव, नरसिंह भगवान, हनुमान जी , मां काली, गौरी शंकर शेषनाग फूलमति माता ब्रहमदेव, और जालपा देवी के मंदिर भी स्थित है।
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नवरात्रि के दौरान मन्दिर मे ऊपर जटायुक्त नारियल ले जाना प्रतिबन्धित है कॄपया नीचे नारियल तोडने की मशीन का उपयोग करें ।
नवरात्रि पर माँ शारदा के अंकित चित्रो व माँ शारदा यंत्र के सोने एवं चाँदी के सिक्के माँ शारदा प्रबंध समिति के कार्यालय(प्रथम सीढी के पास) उप्लब्ध है
Rajiv Gandhi Group of Institution,
Satna(M.P.)